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माईभाखा समरिधी पहल - सतत माईभाखा प्रतियोगिता आयोजन

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राउर विचार , सुझाव बहुते काम के रही। ----------------------------------------- # माईभाखा   कहानी अउर   # कबितई   # प्रतियोगिता   की सफलता से मन एकदम्मे गदगद बा। दरअसल इ प्रतियोगिता ना हो के एगो सतत चलेवाला पहल बा , बस माईभाखा भोजपुरी के लेखन से समरिध करे खातिर अउर साथे-साथे हर लिखवइया के प्रोत्साहित करे खातिर। कबितई प्रतियोगिता में आपन रचना भेजे वाला हर कबि के नमन बा अउर पुरस्कार ना मिलल त का भइल , रउआँ लिख के ए पहल के साकार कइनीं , इ हे रउआँ अउर आयोजक दल खातिर सनमान बा। एतने ना , संग्रह में   हर कबि की रचचन के सादर प्रकासित कइल जाता.....अउर रउआं सब के सनमानित करत नव जागरन प्रकासन एक-एक प्रति सबके सादर भेंट करी....अउर त अउर इ संग्रह के परचार-परसार होई त साथे-साथे माईभाखा के परचार-परसार भी होई अउर जेकरी-जेकरी लगे इ संग्रह पहुँची उ सब भी त रउआँ के पढ़ीं अउर सहेज के रखी....इ सब ए ले लिखत तानी की पहल महत्वपूर्ण बा , माईभाखा के समरिधी महत्वपूर्ण बा अउर साथे-साथे रउआँ सब के जोगदान। जय-जय। ----------------------------------------- अब अपनी बात पर आवतानी- जल्दिए ...

माईभाखा कबितई प्रतियोगिता – 2017 के परिनाम घोसित

माईभाखा कबितई प्रतियोगिता के परिनाम रउआँ सब की सोझा राखत मन बहुते प्रसन्न बा। सबसे पहिले त हम ओ रचनाकार लोगन के सादर नमन करतानीं जे अपनी माईभाखा में लिखेला, ओकरी साथे-साथे ओ सब लोगन के जे सकारात्मक रूप से माईभाखा के कवनो न कवनो तरे समरिध कइले में लागल बा। अरे एतने ना , सही तरे देखीं त सबसे अधिका धन्यवाद के पात्र त पाठक महानुभाव लोग बा , जे समय निकाली के रचचन के पढ़ेला। आज माईभाखा भोजपुरी कवनो परिचय के मोहताज नइखे। एकर डंका देस का विदेसन में भी बज रहल बा। इ पूरा तरे बैग्यानिकता पर खरा उतरत हर जगहि आपन मिठऊ अउर सरल छाप छोड़ रहल बिया। अभोजपुरिया भी एकर होत चलि जाता लोग। दिन-दिन एकर दायरा बढ़त चलि जाता , इ समरिध होत चलि जा तिया पर हँ , इ हो बात सही बा की अपनी कुछ लोगन की चलते इ तनि उपेछित भी बिया..... एकरा अबहिन जहाँ रहे के चाहीं , उहां पहुँच नइखे पवले। खैर , माइयो भाखा के अच्छा दिन आई , भोजपुरिया लोग दिल खोलि के एकर गुनगान गाई। आपन बात- सबसे पहिले त हम 47 मान्यवर कबिजी ( जे आपन कबिता भेजले रहल ह ) लोगन के नमन करतानीं अउर हिरदय से आभार वेयक्त करतानीं। अगर इहाँ सब आपन कबिता ना ...

47. श्री आशुतोष पाण्डेय उर्फ आशु बाबा जी के 2गो कबिता (गीत) (93, 94) - माईभाखा कबितई प्रतियोगिता

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1. *भोजपुरी गायक लोग के गीत  चोरी कके गावे वाला मानसिकता प व्यंग्य* गावल गावल गानावा के चोरी कके गाईब,रावा रोक लींहीं ना! बाज आदत से ना आईब ,रावा रोक लीहीं ना। आज आपन जश्न हम अपने मनाईब,रावा रोक लीहीं ना बाज आदत से ना आईब रावा रोक लीहीं ना।टेक। हमरा नियन गाना देखीं गावे नाहीं कोई, हमरा प्रोग्रामवा मे अब आवे नाही कोई। नाहीं जब आईब जबरदस्ती बोलाईब,रावा रोक लीहीं ना बाज आदत से ना आईब......।टेक। ना आपन शब्द नाहीं राग रस सिखनी, "आशु बाबा" अति भईल तब एगो लिखनी। नाहीं जब सुनब पुरजोर चिचिआईब,रावा रोक लिहीं ना, बाज आदत से ना आईब.....।टेक। 2.  *कुआर मे अपना सजना से सजनी के नटखट निवेदन*       *लागतारे लाज हो* रातहिं अँगानावाँ मे चौका पुराईल माई के आवे के शुभ दिन आईल। लेके तत्काल टिकट ,आजा राजा तुहूँ घरे, देखे के दाशाहारा मेला,राजा बाडा मन करे।टेक। आपन गँउवां मे होला डारामा कि बाबूजी लेलन पाठ हो, टोला मोहाल्ला के देवर संगे जाए मे लागता लाज हो। गाँव के डारामावां बाबूजी के पाठ हो, देवरन के संगवा मे लागतारे लाज हो। चिनिया वेदाम प फुसुलावता केहु तरे, ...

46. श्री ज्ञानेश्वर गुंजन जी के 2गो कबिता (गीत) (91, 92) - माईभाखा कबितई प्रतियोगिता

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 1. "कुकुर पुजौटी पर" काथी बताई सुनाई रे गुइयाँ कुकुर पुजौटी पर गोसयाँ बा भुइयाँ! बिगड़ ईमान - धरम बिगड़ बा नाता मनई के मतिया ना गतिया चिन्हाता! हवा अनाज - पानी देसवा के खाता गारी दे देसवा के पुतवा अघाता!! देसवा के अगुआ भईल पनछुइयाँ! कुकुर पुजौटी पर गोसयाँ बा  भुइयाँ ...... आस जोहे बरखा के खेत खरिहनवा पूजा - नमाज करें खेत में किसनवा! करजी के चिन्ता से कलपता मनवा साँसत में पड़ल बा पातर परनवा!! लागता बदरा ह सेमर के रुइयाँ ! कुकुर पुजौटी पर गोसयाँ बा भुइयाँ..... पुरखा - पुरनिया के रोवता बंगला पुसतैनी घर के उजड़ गईल जंगला! देखी दुअरिया के आँख में रोवाई घोठा आ घारी के सिसकी सवाई!! लागेला गअवाँ के सहरे मुदइयाँ! कुकुर पुजौटी पर..................... सुख - चैन जिनगी से बाटे लपाता हाय पइसा हाय पइसा सभे चिलाता! पइसे ला टूटता रोज नेह -  नाता लालच के रोग देखी रिश्ता के खाता!! सेतिहे में चाहे सभे अनकर चिजुइयाँ! कुकुर पुजौटी पर......................... हवा - हवाई में सभ कुछ बुझाता सपने में सोना आ चानी कटाता! कागजे पर बान्हि - पुल सगरो बन्हाता चुटकी में लाखो - करोड़ो गन...

45. श्री भगवान पाण्डेय जी के 2गो कबिता (गीत) (87, 88) - माईभाखा कबितई प्रतियोगिता

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1. गीत  चाँद झांके बदरिया के पार            अँजोरिया बारि-बारि के। रात विहंसेले करिके  सिंगार             सनेहिया   ढ़ारि-ढ़ारि के। अँगना में अंखुआइल असरा फुलाइल रजनी   के  गंध  में सपनवां  भुलाईल रचे लागल  ई अलगा संसार               डहरिया  झारि-झारि के। बाँसुरी   बजावेले  घनी    बंसवरिया सुध-बुध भुलाईल बा एही  नगरिया जहाँ  बगिया  लुटावे  बहार                 मोजरिया गारि-गारि के। खोजे  चंदनिया   में  चकवा चकइया गदराइल बाग  भरल  तलवा तलइया फूल  भंवरा  खातिर  बेकरार                  पंखुरिया  झारि-झारि के। टुकुर...

44. नवीन कुमार पांडेय जी के 2गो कबिता (गीत) (85, 86) - माईभाखा कबितई प्रतियोगिता

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1.  का कहीं कुछ कहल ना जाता का कहीं कुछ कहल ना जाता आ बिना कहले रहल ना जाता। उग्र राष्द्रवाद बिन मौसम के पानी आ छ्द्म धर्ममिरपेक्षता छाता, बन के उग्र अब लड़ता दुनुं हो गएल उदारवाद लापाता। का कहीं कुछ कहल ना जाता आ बिना कहले रहल ना जाता। दल आ शासन के बात का रखीं बन गएल बा दुनुं जांता के चक्की आपस में मिलजुल  चलता दुनुं आ बिचहीं  में जनता पिसाता ।का कहीं कुछ . . . . जात धरम में दुरभाव बढ़ऽता शासन के देहल घाव बढ़ऽता, रक्छक अब भक्छक बन बइठल बचइहऽ भारत के हे भाग्यविधाता। का कहीं कुछ कहल ना जाता आ सोंच-सोंच के मन घबराता। 2.  लोगवा त लाखे मिलेऽला जिनिगिया में लोगवा त लाखे मिलेऽला जिनिगिया में कइसे केहु चितवा के चोर बन जाला । चितवे ली चानवा के तरुणी जे रतिया में रह - रह के मनवा चकोर  बन जाला । चित् के चिरईया जे कुहुके पिया बिनुं देखते  सजन के ई मोर बन जाला । देखे सपनवा में सजना के जब -जब नींदिया टुटे  रतिया भोर बन जाला। बाटे जे पनीया ई देहिया के भीतर निकले नयन से त लोर बन जाला । जवने पवनवा फगुनहटा ह फागुन में तवने चइऽत  में झकोर बन जाला । नवीन ...

43. डॉ मनोज कुमार सिंह जी के 1गो कबिता (गीत) (84) - माईभाखा कबितई प्रतियोगिता

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दोहा मनोज के... सुन्नर,मधुरी बोल आ, लेके सहज सनेस। भोजपुरी के बेल इ,फइलल देस बिदेस। बीस करोड़न लोग के,जीवन के रस धार। भोजपुरी माँगत बिया,अब आपन अधिकार।। भोजपुरियन के देखि लीं,मन के मधुर सुभाव। रहल कबो ना आजु ले,हिन्दी से टकराव।। भोजपुरियन से बा भरल,यूपी अउर बिहार। उहे बनावेला सदा,दिल्ली के सरकार।। अक्खड़पन भरपूर आ,दिल से सहज पवित्र। स्वाभिमान भोजपुरिया,होला शुद्ध चरित्र।। माई भासा ही असल,मनई के पहचान। दोसर भासा ले सकी, ना ओकर स्थान।। संस्कृति के पहचान के,सबसे सुन्नर नेग। भासा जब साहित्य के,ओर बढ़ावे डेग।। अपना भासा के अलग,होला कुछ जज्बात। बड़ी आसानी से कहे,दिल के सगरी बात।। भोजपुरी पहुँचल कबो,ना राजा दरबार। सदा उपेक्षा ही मिलल,राजतंत्र के द्वार।। भोजपुरी के नाम पर,झंडा आज तमाम। खुद के जिंदाबाद बा,औरन के बदनाम।। भोजपुर में भोजपुरी,नया कवन बा बात। अब त एहके बोलताs,कलकत्ता-गुजरात।। भजन भजेलें उ भले,भोजपुरी के रोज। लउके भासा से अधिक,उनकर आपन पोज।। भोजपुरी फुहड़ता पर,करिके कड़क प्रहार। सुघर सही हर बात के,निसदिन करीं प्रचार।। कतना आज समाज में,जर्तमुआह सुभाव।। बिना बात प्रतिशोध में,लउके गाल बजाव...