16. रत्नेश चंचल जी के दुगो कबिता (28, 29) - माईभाखा कबितई प्रतियोगिता

1. अब ना चहकेले गौरइया
-----------------------------
दिन बदल गइल रात बदल गइल 
पहिले वाली बात बदल गइल ,
रही- रही टीस उठेला हमरा मनवां में 
अब ना चहकेले गौरइया अंगनवा में |
केहु ना दुअरा पर लउके बइठल सबे चुहानी बा
बेड बिस्तरा कूलर टीवी तबो सून दलानी बा,
बिरहा कजरी सुनाला ना सिवनवां में
अब ना चहकेले गौरइया अंगनवा में |
अब त सून बंड़ेरी लागे उचरे नाहीं कागा
भरके ना चुल्हा के आगी टूटे सगुन के धागा,
झुलुआ लागे नाहीं संउंसे सवनवां में
अब ना चहकेले गौरइया अंगनवा में |
राजा वाला कहनी हमरा बचवा के ना आवेला
गुल्ली डंडा खेल मदाड़ी बचपन याद दिलावेला
केहु गावे नाहीं फगुआ फगुनवां में 
अब ना चहकेले गौरइया अंगनवा में ||


2. गउआं के माटी
--------------------
बम्बे के ताज होटल जुहू चौपाटी
सबका से निमन हमरा गउआं के माटी|
धनवां के ढेरी जब लउके खरीहनवां
बाबूजी के ओठे खिल जाला मुस्कनवां
सरसो के फूल से जब महके सिवान रे
लागेला सुनाये तब फगुआ के तान रे
देखी के उतान होइ जाला मोर छाती
सबका से निमन हमरा गउआं के माटी |
मन भावे बरम बाबा के चउतरवा
भोरहीं अजान संगे गूंजे जयकरवा
कहीं गूंजे मानस के दोहा चौपाई
कहनीं सुनावे रोज रतीया के माई
चइता आ कजरी के बोल जहाँ खांटी
सबका से निमन हमरा गउआं के माटी|
बचवा बोलावे चंदा मामा आरे- पारे
दूध-भात लेले अइह नदीया किनारे
बचीया खेलेले रोज सुपली मउनीयां
कबो बने दुलहा त कबो दुलहीनियां
गुल्ली डंडा खेल कबो पुछे न जाति
सबका से निमन हमरा गउआं के माटी ||


रत्नेश चंचल 
एम.ए. हिन्दी (बीएचयू), बी.एड.
लिखे हुए गीतों का अाकाशवाणी व दुरदर्शन पर प्रसारण | लगभग ७० हिन्दी,भोजपुरी एलबम में लिखे हुए गीत |
कई पत्र पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित | कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ |
वर्तमान पता-
श्वेताभ अपार्टमेंट,फ्लैट नं- ८
संकटमोचन रोड लंका - वाराणसी ( यूपी)- २२१००५
स्थायी पता- ग्राम - कवार,पोस्ट- कुड़ासन
जनपद- कैमूर भभुआ (बिहार)-८२११०१
मोबाइल - ९३३५५०५७९३,९४३११७७११३

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

1. पंकज यादवजी के दुगो कबिता (1, 58) - माईभाखा कबिताई प्रतियोगिता

सुनतानी जीं - माईभाखा कबितई प्रतियोगिता घोसित हो गइल।

अब कवितई (कविता प्रतियोगिता) के भाँजा