15. प्रतिक तिवारी जी के दु गो कबिता (25, 26) - माईभाखा कबितई प्रतियोगिता

(१) का लइकी भइल ही हमार बाटे दोस

ए माई हम उड़े के चाह तानी
उड़त उड़त आसमान छुवे के चाह तानी

अपना संगे संगे तोर नाव ऊंचा करेके चाहतानी
दुनिया कइसन बिया इ हम ऊंचाई से देखल चाहतानी

लेकिन ये माई बाबूजी कहेले कि तू लइकी हउ
तहरा ढेर उड़े के सपना ना देखे के चाँही

माई हम लइकी हई त एमे हमार का दोस
का एहके वजह से हम नईखी रह सकत खुस

हम काहे तनिये मनी में राखी संतोस
का लइकी भइल ही हमार बाटे दोस

ए माई हम उड़े के चाह तानी
भर अकास अपना कोरा मे भरे चाहतानी।।



(२) मनई
आदमी रही त जाति धरम कामे आई
जब जीउ ना रही त ई केकरा से चिन्हाई।।

खून बा सभकर एके रंग के
का खूनवो के रंग अब बदलाई।।

हम बड़का हई तूं छोटका
कइला से का केहु कुछउ पाई ।।

हमार धरम बड़ ना हमार धरम बड़
आपुसे में बांटला से का केहु चैन से रह पाई।।

हमार बात ऊपर ना हमार बात ऊपर
चिलइला से केहु का आगे बढ़ पाई।।

हम मरद तूं मेहरारू पैदाइस
एहसे का मर्दानगी साबित हो जाई।।
  
(नाम पता -  प्रतिक तिवारी, गाँव कर्णपुरा
जिला- सिवान बिहार
वर्तमान पता - मुम्बई )

टिप्पणियाँ

  1. सुन्नर प्रयास कइलीं ह तिवारी जी ! भाव त श्रेष्ठ बड़ले बिया ...तन काव्यात्मकता के क्षेत्र में प्रयास करे के आवश्यकता बा । हमार शुभकामना आ अशीष !

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  2. रचना बहुत सुन्दर लगली सन

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