13.कन्हैया प्रसाद तिवारी जी के दु गो कबिता (19, 20) - माईभाखा कबितई प्रतियोगिता

1
गाँव
***
 हो बटोही डेग बढ़ावऽ अपना गाँव का ओर 
काहें भगलऽ छोडके घर अब इहवों मिली अँजोर
ललकी किरिनिया स्वागत करी देह में फूर्ति लाई भुअरी भँइस के मीठ दूध ह तन के ताप बढ़ाई
टुअर ना रहब इहँवा तु हीत-मीत सब साथे बा
लउकी चरू ओर हरियरी ललका गमछा माथे बा
शहर में सब साधन बा लेकिन गाँव के मत गरियावऽ
दरसन करे मात-पिता के कबहुँ गाँव में आवऽ
बिजली आइल बिया गाँव में सड़को सुनर लागत बा
ए बबुआ तु साथे नइख बूढ़वा भइल अभागत बा
पहिले जइसन गउवो नइखे सब साधन मौजूद बा
पेट भरे शहरी के गँउवा के त अबे वजूद बा
गाय के गोबर निमन बा माथे पर तिलक लगावेलन
रसिक कन्हैया खुश होके गउवाँ क महिमा गावेलन

2
कहाँ गइल
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कहाँ गइल झपताल कहरवा
कहाँ गइल पुर्वी क बोल
खटिया के पटिया टूटत बा
बनल गवइया बा बकलोल

ताल सुरन से नाता नइखे
बदजुबान बउराइल बा
बेटी बहन सकल नारी के
इज्जत छान्ह धराइल बा

निरगुन बिरहा भजन भाव सब
गिरल बा गड़हा पानी में
डीजे पर सभ थिरकत बाडे
मस्त बा सभ नादानी में

काजर धुलल बा कजरी के
सोहर के अब शोहरत नइखे
जँतसर और खेलवना डुबल
ठुमरी अब ठुमकत नइखे

कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक

टिप्पणियाँ

  1. तिवारी जी के पीड़ा स्पष्ट दिख रहल बा । गाँव ए के संस्कृती से भारत के सांस्कृतिक पहचान बा । एहकै संरक्षित करे खातिर सब लोगन के सहयोग अपेक्षित ह । "कहाँ गइल" खातिर हमार शुभकामना स्वीकार करीं जा म्हाराज !

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